कुछ राजनितिक सदबुद्धि-जीवियों को अपूर्ण खेद है के २८ अप्रेल को
अरविंद जी ने जो टोपी पहनी उस पर उर्दू में लिखा था “मैं हूँ आम आदमी”
भारत कि किसी भी भाषा में लिखकर देख लीजिये! अर्थ केवल एक ही निकलेगा
‘’आम आदमी’’ अर्थात राजनीती, भ्रष्टाचार, गरीबी और घोटालों से दबा कुचला वह
जनमानुष जिसकी सुध लेने की सुध किसी को नहीं| वह दिन प्रति दिन और गरीब होता जा
रहा है, असहाय होता जा रहा है, भ्रष्टाचार और घोटालों ने जिसका जीवन नरक से भी
बत्तर कर दिया है|
लोग कह रहे है के हम मुस्लिमों का तुष्टिकरण कर रहे हैं| अगर धर्म
निरपेक्ष होना किसी का तुष्टिकरण है तो हाँ हम कर रहे हैं तुष्टिकरण| असल में
धर्मनिरपेक्षता का ठेका तो इस देश में केवल उन राजनितिक दलों ने ले रखा है
जिन्होंने १९८४ में सिख दंगे कराये या उन्होंने जिन्होंने बाबरी मस्जिद को धर्म के
नाम पर ध्वस्त कर दिया और २००० मे गोधरा कांड करा कर अपनी धर्मनिरपेक्षता का
उदाहरण पूरे भारतवर्ष में प्रस्तुत किया| धर्मनिरपेक्षता का रोना रोने वाले बाकि
धर्मनिरपेक्ष राजनितिक दलों की धर्मनिरपेक्षता उस दिन सामने आ जाती है जिस दिन वह
इन दोनों धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को समर्थन देती हैं|
ऐसा नहीं है के हम इन्हें उत्तर नहीं दे सकते परन्तु हमेशा बुजुर्गों ने ये ही सिखाया है के “अंधे के आगे रोना, और अपने दीदे खोना”
ऐसा नहीं है के हम इन्हें उत्तर नहीं दे सकते परन्तु हमेशा बुजुर्गों ने ये ही सिखाया है के “अंधे के आगे रोना, और अपने दीदे खोना”
वो दो कहें तो चार कहने का हक़ रखते हैं...
ख़ुदा ने दी भी है फ़ितरत हमको...
दबे से रहते हैं तालीम है बुजुर्गों की...
वरना सिखलाते बात करने का लहज़ा तुमको...
पी.एस.
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